Thursday, 12 June 2014

पसीना आना शरीर की स्वाभाविक क्रिया है

Posted by Unknown

पसीना -

पसीना आना शरीर की स्वाभाविक क्रिया है | यह शरीर को उसके सामान्य तापमान को बनाये रखने में मदद करता है | हमारे शरीर का सामान्य तापमान ३७ डिग्री सेन्टीग्रेड होता है और सारे कार्यों को संपादित करने हेतु शरीर को यह तापमान बना कर रखने की आवश्यकता होती है | किसी भी कारण से हमारे शरीर के गर्म होने से उसमे मौजूद खून भी ऊष्मा पाकर गर्म हो जाता है और जब यह गर्म खून दिमाग के हाइपोथैलेमस भाग में पहुंचता है तो उसे उत्तेजित कर देता है | इसके फलस्वरूप परानुकम्पी तंत्रिकाओं के माध्यम से शरीर के ताप को सामान्य और काबू में रखने वाली क्रियाएँ जैसे पसीने का स्वेदग्रंथियों में बनना शुरू हो जाता है,जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों में उत्सर्जित होने लगता है | पसीना स्वेद ग्रंथियों में बनता है,जो हमारे शरीर की त्वचा के नीचे खासतौर पर हाथों की हथेलियों,पैरों के तलवों और सिर की खाल के नीचे होती हैं | ज्यादा पसीना बहने से शरीर में पानी और लवणों की कमी हो जाती है जिससे सिर में दर्द,नींद और कभी-कभी उल्टी भी आने लगती है | गर्म वातावरण में ज्यादा देर तक खाली पेट काम नहीं करना चाहिए| 

१- अधिक पसीना आने पर कभी-कभी रोगी का शरीर ठंडा पड़ने लगता है और उसकी नाड़ी तथा सांस की रफ़्तार बहुत तेज़ हो जाती है | ऐसे में रोगी को टमाटर के रस में नमक और पानी मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाते रहने से लाभ होता है |

२- हरड़ को बारीक पीस लें | जहाँ पसीना अधिक आता हो , इसको मल लें और दस मिनट बाद नहा लें | इससे ज़्यादा पसीना आना बंद हो जाता है |

३- कुछ लोगों को पैरों में अधिक पसीना आता है | ऐसे में पहले पैरों को गर्म पानी में रख लें,फिर ठंडे पानी में रखें और दोनों पैरों को आपस में रगड़ लें | फिर पैरों को बाहर निकालकर किसी कपडे से पौंछ लें | एक हफ्ते तक यह क्रिया लगातार करने से बहुत लाभ होता है |

४- यदि पसीने में बदबू आती हो तो भोजन में नमक का सेवन कम करना चाहिए |

५- गर्मियों में पसीने के साथ- साथ शरीर में घमौरी भी निकल आती हैं | इसके लिए नहाते समय एक बाल्टी पानी में गुलाबजल की २० बूँदें डालकर स्नान करें | रात को ४ चम्मच गुलकंद खाकर ऊपर से गर्म दूध पीने से भी लाभ होता है 
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आज हम आपको भृंगराज के आयुर्वेदिक गुणों से अवगत कराएंगे

Posted by Unknown

भृंगराज (भांगरा) -

घने मुलायम काले केशों के लिए प्रसिद्ध भृंगराज के स्वयंजात शाक १८०० मीटर की ऊंचाई तक आर्द्रभूमि में जलाशयों के समीप बारह मास उगते हैं |सुश्रुत एवं चरक संहिता में कास एवं श्वास व्याधि में भृंगराज तेल का प्रयोग बताया गया है | इसके पत्तों को मसलने से कृष्णाभ, हरितवर्णी रस निकलता है, जो शीघ्र ही काला पड़ जाता है | इसके पुष्प श्वेत वर्ण के होते हैं | इसके फल कृष्ण वर्ण के होते हैं | इसके बीज अनेक, छोटे तथा काले जीरे के समान होते हैं| इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से जनवरी तक होता है | आज हम आपको भृंगराज के आयुर्वेदिक गुणों से अवगत कराएंगे -



१- भांगरे का रस और बकरी का दूध समान मात्रा में लेकर उसको गुनगुना करके नाक में टपकाने से और भांगरा के रस में काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सिर पर लेप करने से आधासीसी के दर्द में लाभ होता है |

२- जिनके बाल टूटते हैं या दो मुंह के हो जाते हैं उन्हें सिर में भांगरा के पत्तों के रस की मालिश करनी चाहिए | इससे कुछ ही दिनों में अच्छे काले बाल निकलते हैं |

३- भृंगराज के पत्तों को छाया में सुखाकर पीस लें | इसमें से १० ग्राम चूर्ण लेकर उसमें शहद ३ ग्राम और गाय का घी ३ ग्राम मिलाकर नित्य सोते समय रात्रि में चालीस दिन सेवन करने से कमजोर दृष्टी आदि सब प्रकार के नेत्र रोगों में लाभ होता है |

४- दो-दो चम्मच भृंगराज स्वरस को दिन में २-३ बार पिलाने से बुखार में लाभ होता है |

५- दस ग्राम भृंगराज के पत्तों में ३ ग्राम काला नमक मिलाकर पीसकर छान लें | इसका दिन में ३-४ बार सेवन करने से पुराना पेट दर्द भी ठीक हो जाता है |

६- भांगरा के पत्ते ५० ग्राम और काली मिर्च ५ ग्राम दोनों को खूब महीन पीसकर छोटे बेर जैसी गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें| सुबह -शाम १ या २ गोली पानी के साथ सेवन करने से बादी बवासीर में शीघ्र लाभ होता है |

७- दो चम्मच भांगरा पत्र स्वरस में १ चम्मच शहद मिलाकर दिन में दो बार सेवन करने से उच्च रक्तचाप कुछ ही दिनों में सामान्य हो जाता है |

८- यदि बच्चा मिट्टी खाना किसी भी प्रकार से न छोड़ रहा हो तो भांगरा के पत्तों के रस १ चम्मच सुबह शाम पिला देने से मिट्टी खाना तुरंत छोड़ देता है 
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